Sunday, September 26, 2010

पतझड़ का पेड़

मैं पतझड़ का पेड़ हूँ,
छाया और हरित विहीन,
अपने आप टूट रहा हूँ,
अनगिनत आशाएं
फूली फली कभी,
और अनगिनत बहारों में,
आये कितने ही फूल और  फल,
मोहक आकर्षण में ,
कितने ही पंथियों का था,
मै आश्रय स्थल,
बहारों के साथ,
काफिला खिसक गया,
प्यार और अपनापन,
छूमंतर हो गया,
और अब है
यहाँ वीरान,
मरघट सा सुनसान
शायद
फिर कोई आये
अपना हाथ बढाये
प्रेम का दिया जलाये
 और
मेरे  सूखेपन का श्राप
फलित हो जाये,
इस आशा में,
थोडा सा ही सही
जमीन से जुड़ा हूँ मै,
और
प्रतीक्षा में
सूखा ही सही
न जाने कब से,
खड़ा हूँ मै.
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  - शिव प्रकाश मिश्र
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Saturday, September 11, 2010

कौन हूँ मैं

कौन हूँ मैं, कहाँ से गुजरता रहा ?
आज पूंछो अभी तक क्या करता रहा ?


एक चाहत लिए दावं रखता रहा ,
शह उनकी पे ही मात खाता रहा.
हार कर मैंने खोया नहीं हौसला,
जीत की हार होना नहीं फैसला.
आज ऐसा नवी बन गया अजनवी,
रोज़ जिसको हृदय में बिठाता रहा.
आज पूंछो अभी तक क्या करता रहा ?.......




एक पागल पथिक सा फिर दर बदर,
कितनी मंजिल चली कुछ नहीं है खबर,
ताक पर आश सपने सजाता भी क्या ?
नीर पलको पे आँखें चुराता न क्या ?
आज ऐसी कहानी नहीं कह सका ,
शब्द जिसके लिए दूड़ता फिर रहा.
आज पूंछो अभी तक क्या करता रहा ?.......
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        - शिव प्रकाश मिश्र
           shiv prakash mishra
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कुछ कह रहे हैं

कुछ कह रहे हैं,
सूखे की आग में
जलती फसलो को देख,
जी को जला कर
 जी रहे है.
डीजल केरोसीन डीलरो की तरह
इन्द्र का स्टॉक में नहीं है की तख्ती देख
 रो रहे हैं.
भूख से बिलखते सिसकते आदिवासी,
 बेबस मजबूरी में
जड़े ही खा रहें है,
करके हड़ताल  नज़रबंदी में,
 नशा बंदी में ,
भंग छान ,
मस्ती में लम्बी तान,
 इन्द्र अब भी सो रहे हैं !!
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     - शिव प्रकाश मिश्र
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हड़ताल

होकर परेशान,
 महगाई भत्ते से,
 वर्षा विभाग सहित
 इन्द्र ने कर दी हड़ताल,
सूखे की आग में,
 जलती फसलो को जैसे
घर में श्मसान देख,
 जनता हो गयी बेहाल .
आवश्यक सेवाओं में भी,
 अब तो हड़ताल होने लगी है,
नजरबंदी में
जमाखोरी की आदत बनी है.
हे इन्द्र देव !
अब तो दया कर दो,
कण्ट्रोल से न सही,
ब्लैक में ही,
वर्षा कर दो !!
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    - शिव प्रकाश मिश्र
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मूल कृत - १९७९, ६ नवम्बर १९७९ को दैनिक वीर हनुमान औरय्या में प्रकाशित 

आतंकी प्यास... एक कवि की....

 प्यास से व्याकुल एक व्यक्ति ने,
एक घर का दरवाजा खटखटाया,
एक 
कविनुमा चेहरा  बाहर आया,
जिसे देख कर वह व्यक्ति बोला ,
"प्यासा हूँ" ....अगर .....पानी...
 मिल जाये
"हाँ हाँ क्यों नहीं " कह कर कवि ने
उसे ड्राइंग रूम में बिठाया,
और खुद भी बैठ कर बोला,
कल भी मैं प्यासा था,
 आज भी मै प्यासा हूँ,
सब कुछ आस पास है,
 फिर भी मन उदास है,
न जाने कैसी प्यास है ?
प्यासे व्यक्ति को बात समझ नहीं आयी,
कवि ने बात थोडा आगे बढ़ायी,
वह था ग्यारह सितम्बर,
अमेरिका पर आतंकी कहर,
उसी के अपह्रत विमानों को
वर्ड ट्रेड  सेंटर से टकरा दिया,
एक सौ दस मंजिली बिल्डिंग को,
 धूल में मिला दिया,
हजारो सिसकियाँ मलबे में दफ़न हो गयी,
समूचे विश्व की आत्मा दहल गयी,
कौन थे हमलावर ? क्या उद्देश्य था ?
न इसका आभास है,
न जाने कैसी प्यास है ?
प्यासा व्यक्ति घबराया,
उसे लगा,
 कवि उसकी बात समझ नहीं पाया,
उसने सोचा विज्ञापन की भाषा में बताएं,
शायद समझ .........जाये   ...,
पानी की जगह पेप्सी मिल जाये,
ये सोच कर बोला,
"ये दिल मांगे मोर"
कवि ने कहा "श्योर"
और बोला
वे पूरी दुनिया की करते थे निगरानी,
पर अपने घर की बात ही न जानी,
चार चार विमान एक साथ अपह्रत हो गए,
दुनिया की सुरिक्षतम जगह,
पेंटागन पर हमले हो गए,
अब आतंकी साये में ,
आतंकियों की तलाश है,
न जाने कैसी प्यास है ?
प्यासा व्यक्ति चिल्लाया -
"ओह नो"
कवि बोला " ओह यस"
इतिहास गवाह है,
जो भस्मासुर बनाता है,
यह उसी के पीछे पड़ जाता है,
आतंकवाद का दर्द भी,
 तभी समझ में आता है,
जब कोई स्वयं,
 इसकी चपेट में आता है,
आतंकवाद से लड़ने के लिए,
 वे उसी के साथ खड़े है,
 जिसके तार स्वयं आतंकवादियों से जुड़े हैं,
आतंकवाद से लड़ने का
 यह अधूरा प्रयास है,
न जाने कैसी प्यास है ?
प्यासा व्यक्ति निढाल हो ,
सोफे पर लुढ़क गया,
यह देख
कवि पत्नी का दिल दहल गया,
वह बोली
न आप अमेरिका हैं , न पाकिस्तान,
न रूस है , न अफगानिस्तान,
आप भारत हैं ,
और भारत को
दूसरो की आश छोडनी होगी,
आतंकवाद के खिलाफ,
 अपनी लडाई स्वयं  लडनी होगी,
इस बिचारे को  तो नाहक सता रहे हो ,
पानी की जगह कविता पिला रहे हो,
यह मूर्क्षित व्यक्ति, कोई और नहीं,
 स्वयं एक बड़ा आतंकवादी है,
न इसका तुम्हे ..अहसास है ?
ओफ़ ..न जाने कैसी प्यास है ??
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 -शिव प्रकाश mishra
-SHIV PRAKASH MISHRA
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कैसे.. कैसे.. लोग

खुद मरने की मन्नत मनाते हैं लोग,
हंसते हंसते भी रोते से रहते है लोग .

सूना घर     है   कोई रहने वाला नहीं  ,
छत में रहने को कितने तरसते हैं लोग.

कोई      अपना नहीं कोई     सपना नहीं,
कितने अपने भी सपने से लगते हैं लोग.

फासले हैं   बहुत फिर    कितने    करीब ,
कितने अपनो    से दूरी बनाते   हैं लोग .

क्यों ज़नाज़ा गया ? जानते हैं सभी,
फिर भी मरने से कितना डरते हैं लोग.

ऐ सितम अब शिव पर क्या भरोसा करे,
अपनी छाया से अक्सर डरते हैं लोग..
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             - शिव प्रकाश मिश्र
                मूल कृति जून १९८०
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Friday, September 10, 2010

दाग हूँ मैं.....

छोड़ दो साथ अब मेरा एक बुझता चिराग हूँ मै,
नहीं भाता   किसी को वह बदनुमा      दाग हूँ मै,
यही दुर्भाग्य है मेरा    न आया काम     कुछ तेरे,
सिवा दुःख दर्द  गम के    नहीं  था पास कुछ मेरे,
आज चाहो तो मुझे अंतिम मधुर मुस्कान दे दो,
दिया हो ना किसी को   या  वही  अपमान दे दो,
अँधेरी  वादियों में भटकता   विरह का राग हूँ मैं,
नहीं भाता    किसी को वह     बदनुमा दाग हूँ  मै !  ......१....

आत्मा पर बोझ बन कर, चाह कर भी न बोल पाया,
रिस रहे घाव अंतर में ,कभी उनसे नहीं   पर्दा उठाया,
आज   चाहे इस तपस्या  का  यहीं अवसान कर दो,
कहूँगा    कुछ     नहीं    चाहे   मुझे बदनाम कर दो,
नहीं      बुझती  कभी,       ऐसी सुलगती आग हूँ मैं,
नहीं  भाता   किसी    को  वह बदनुमा  दाग हूँ मै !!   .....२....
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          - शिव प्रकाश मिश्र
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